मग़मूम अगर हूँ मैं तो रंज़ीदा है वो भी
उलझा हूँ किसी सोच में पेचीदा है वो भी
कुछ करना है अब इश्क़ की मे'राज के ख़ातिर
मैं सोच रहा हूँ मियाँ संजीदा है वो भी
आसूदगी के बा'द के मंज़र से हैं वाक़िफ़
डरता हूँ अब उस लुत्फ़ से लरज़ीदा है वो भी
मैं उस के गुमाँ में हुआ फ़रसूदा बजा है
शादाब नहीं है मियाँ बोसीदा है वो भी
जो सोच बदन से कभी होंठों पे न आई
उस सोच की तासीर से शर्मिंदा है वो भी
— Syed Neer Muqeet















