मग़मूम अगर हूँ मैं तो रंज़ीदा है वो भी

  - Syed Neer Muqeet

मग़मूम अगर हूँ मैं तो रंज़ीदा है वो भी
उलझा हूँ किसी सोच में पेचीदा है वो भी

कुछ करना है अब 'इश्क़ की मेराज के ख़ातिर
मैं सोच रहा हूँ मियाँ संजीदा है वो भी

आसूदगी के बाद के मंज़र से हैं वाक़िफ़
डरता हूँ अब उस लुत्फ़ से लरज़ीदा है वो भी

मैं उस के गुमाँ में हुआ फ़रसूदा बजा है
शादाब नहीं है मियाँ बोसीदा है वो भी

जो सोच बदन से कभी होंठों पे न आई
उस सोच की तासीर से शर्मिंदा है वो भी

  - Syed Neer Muqeet

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