वो मेरे जिस्म पे कब हस्ब-ए-हाल आता है
बलाओं ऐश में तो भी मलाल आता है
कभी जो बैठे बिठाए ख़याल आता है
तेरा जमाल ही ले कर मुहाल आता है
कभी वो ज़हर को कहता है जाम-ए-आब-ए-बक़ा
क़सम ख़ुदा की ग़ज़ब का ख़याल आता है
मैं अपनी बात को ख़ंजर बना के कहता हूँ
यूँ सुनने वाले पे सीधा ज़वाल आता है
ये रूप तेरा नहीं है क़सम उठा लूँ मैं
तू ख़ुद को ख़ुद से कहाँ पर निकाल आता है
ये संग बन के मेरे सामने खड़ा क्यूँ है
ये मेरी बाहों में बेहद निढाल आता है
जहाँ पे ख़ाक भी ताब-ए-नज़र नहीं रखती
वहाँ मेरे लिए हुस्न-ओ-जमाल आता है
इसे ग़ज़ल में भी रखने को दिल नहीं करता
ये कैसे दश्त से हो के ग़ज़ाल आता है















