हाथ पकड़ कर वो जब मुझ को अपने पास बुलाती है
मन पीछे हो जाता है धड़कन मेरी बढ़ जाती है
कुछ भी बोलो वो हर बात पे नख़रे ख़ूब दिखाती है
इक इक ग़लती को मेरे दिन रात मुझे गिनवाती है
दूर रहूँ जो मैं तो मुझ को कर के फोन बुलाती है
पास रहूँ तो नैनन से वो मुझ को ख़ूब सताती है
— Shubham Rai 'shubh'















