ta'aruf hai dar-pesh aamir | तआरुफ़ है दर-पेश आमिर

  - Aamir Ali

तआरुफ़ है दर-पेश आमिर
बता दो मैं शाइर नहीं हूँ

  - Aamir Ali

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    गिला है न शिकवा है कोई
    रक़ीबों में अपना है कोई

    वो आला या अदना है कोई
    वो दावा-ए-तक़्वा है कोई

    वो आवाज़ देता नहीं अब
    मुझे यूँ भी रखता है कोई

    ये दामन अगर तुम हटा दो
    तो जाने कि सपना है कोई

    नया साल आने को है अब
    तेरी राह तकता है कोई

    ये ज़ुल्म-ओ-सितम क्या है आमिर
    यूँ वहशत भी लिखता है कोई
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    Aamir Ali
    यहाँ से वहाँ हो गए हम
    फ़ुलाँ थे फ़ुलाँ हो गए हम

    क़दम दो क़दम चलते चलते
    कोई कारवाँ हो गए हम

    गुमाँ है हमें होने का तो
    बड़े बद-गुमाँ हो गए हम

    खिला है नया फूल जब से
    बशर बाग़बाँ हो गए हम

    पढ़ी आयत-ए-इश्क़ तुम ने
    यहाँ तर्जुमाँ हो गए हम
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    Aamir Ali
    किसे बे-ख़बर ढूँढता है
    इधर हूँ उधर ढूँढता है

    वो मुझ से मिला कुछ यूँ जैसे
    बयाबाँ बसर ढूँढता है

    नए शहर में हर मुसाफ़िर
    किराए का घर ढूँढता है

    नज़र से नज़र तो मिली पर
    निशाना जिगर ढूँढता है

    सफ़र पर जो निकले तो पाया
    सफ़र हमसफ़र ढूँढता है

    वो साक़ी तो हाज़िर है हर-दम
    ये मय-कश पहर ढूँढता है
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    Aamir Ali
    शब-ए-ग़म में हैं राज़ कितने
    पिरोए यूँ अल्फ़ाज़ कितने

    उठा रेशमी लाल पर्दा
    दिखाई पड़े साज़ कितने

    वफ़ा महज़ बातें रही है
    वफ़ादार हमराज़ कितने

    ये काँटे ये पत्थर ये ख़ंजर
    हैं अपनों से नाराज़ कितने

    हैं कुछ दाग़ उस चाँद पर जो
    सुख़न-वर भी लफ़्फ़ाज़ कितने
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    Aamir Ali
    सबब बे-सबब याद करता रहा मैं
    बयाबान आबाद करता रहा मैं

    सुना शेर ग़ालिब का फ़रहाद पर जब
    तो फ़रहाद फ़रहाद करता रहा मैं

    हवाएँ बनी ज़ुल्म की दास्ताँ-गो
    परिंदों की इमदाद करता रहा मैं

    सर-ए-आम दुश्मन करे अब तमाशा
    तो इरशाद इरशाद करता रहा मैं

    ज़माना बड़ा सख़्त गुज़रा है 'आमिर'
    ज़माने से फ़रियाद करता रहा मैं
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    Aamir Ali

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