बात उस वक़्त मुझे पूरी समझ जानी थी
जब मुहब्बत ने अदा छोटी सी दिखलाई थी
तेरे चेहरे पे उदासी की झलक आई थी
तेरे दर से नहीं जाने की वजह पाई थी
धीरे-धीरे ही सही जान पे बन आई थी
वक़्त जब लड़ने का था तब मैं तमाशाई थी
उसको भी मुझ सेे मुहब्बत हो गई थी आख़िर
उस सेे निस्बत तो नहीं पाई दुआ पाई थी
किस तरह यार मुहब्बत की वकालत करता
हमने तो की थी मुहब्बत सो सज़ा पाई थी
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