चाबियाँ जिसकी मैं बामी में रखूँगा
नफ़रतों को उस तिजोरी में रखूँगा
चाव से सब इस कहानी को सुनेंगे
बेवफ़ाओं को कहानी में रखूँगा
झूट बोलेगा मगर सच्चा लगेगा
पात्र इक ऐसा कहानी में रखूँगा
बंद हो रस्ता या चाहे आग बरसे
हर समय ख़ुद को रवानी में रखूँगा
यूँँ सजाऊँगा मैं माँ की धानी साड़ी
चाँद तारों को किनारी में रखूँगा
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