कैसे मुममिन है मैं तेरे ज़ुल्फ़ों की बातें न करूँँ
तेरी ज़ुल्फ़ों ने जो दिए उन लम्हों की बातें न करूँँ
कैसे तुमको जवाब दे दूँ तुमने ही तो क़सम दी थी
नाम बदल के भी मैं अपने रिश्तों की बातें न करूँँ
सुनती कब हो तुम तो अपने वाले दिखाने लगती हो
अच्छा यही है तुम सेे अपने ज़ख़्मों की बातें न करूँँ
अच्छे हो माना पर अमृता के इमरोज़ नहीं हो तुम
बेहतर यही रहेगा पिछले रिश्तों की बातें न करूँँ
As you were reading Shayari by Aatish Indori
our suggestion based on Aatish Indori
As you were reading undefined Shayari