इक ज़रूरी सा काम है मुझ पर
आप का एहतिराम है मुझ पर
ख़ून की उल्टियाँ नहीं होती
मौत भी तो हराम है मुझ पर
इश्क़ की हद तुम्हें बताता हूँ
इश्क़ का इख़्तिताम है मुझ पर
ऐसे जीना है मौत हो जैसे
ये भी क़िस्सा तमाम है मुझ पर
मेरी पहचान है फ़क़त इतनी
एक घटिया कलाम है मुझ पर
मेरा सब नाम ले रहे 'अफ़ज़ल'
कितना गन्दा सा नाम है मुझ पर
— Afzal Sultanpuri















