मुसलसल दर पे आने लग रहे हैं
तिरे दर के दीवाने लग रहे हैं
मिरे मुर्शिद सुनो अरदास मेरी
कि मुर्शिद सब सताने लग रहे हैं
कहाँ जाऊँ रहूँगा किस जगह मैं
मुझे पागल चिढ़ाने लग रहे हैं
तुम्हारी आँख है याक़ूत जैसी
मुझे क़लमा पढ़ाने लग रहे हैं
मुसल्ले पर खड़ा होना है मुश्किल
क़दम ये डगमगाने लग रहे हैं
कि मैंने कह दिया बस जोड़ देना
सभी मिलकर घटाने लग रहे हैं
चमकते चाँद पर है दाग़ कैसा
किसे डर कर छुपाने लग रहे हैं
कभी अफ़ज़ल हमारी बात सुनता
कि दुश्मन के निशाने लग रहे हैं
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