दिल धड़कने में मुझे करता तंग है
दिल मिरा अब दिल नहीं एक संग है
क्या हुआ गर साथ ख़ुद के नहीं मैं
तू भी तो जानाँ कहाँ मेरे संग है
आरज़ू किस चीज़ की फिर करे वो
ज़िन्दगी से जो अपनी बैठा तंग है
उसको तो कब का लिया जीत मैंने
जिसके ख़ातिर हो रही तुम में जंग है
क्यूँँ करूँँ मैं वस्ल की ख़्वाहिशें अब
दिल फ़िराक़-ओ-ज़ुस्तज़ू में मलंग है
वो खनकने की सदा चूड़ियों की
वो सदा तेरी सुकून-ए-तरंग है
क्या करेगा कोई मेरी शिकायत
मुझ सेे तो अहमद मिरा दिल भी तंग है
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