vo to qahhaar ho ke baithe hain | वो तो क़हहार हो के बैठे हैं

  - Daqiiq Jabaali

वो तो क़हहार हो के बैठे हैं
हम परस्तार हो के बैठे हैं

रास्ते तुमको पाने के सारे
जान दुश्वार हो के बैठे हैं

आप आए जो मेरे गुलशन में
गुल महक-दार हो के बैठे हैं

वो ख़फ़ा होगा हमने सोचा था
तंज़ बेकार हो के बैठे हैं

रात-दिन बस तेरे ख़यालों में
हम गिरफ़्तार हो के बैठे हैं

नोचने जिस्म एक तितली का
साँप तैयार हो के बैठे हैं

दुनिया तो खै़र ठीक है लेकिन
दोस्त दीवार हो के बैठे हैं

मुझको हथियार की ज़रूरत क्या?
लफ्ज़ तलवार हो के बैठे हैं

कोई अहद-ए-वफा़ करो हम सेे
हम वफ़ादार हो के बैठे हैं

बात करने को दिल नहीं करता
इतने बेज़ार हो के बैठे हैं

'उम्र नादानी करने की है 'अमित'
हम समझदार हो के बैठे हैं

  - Daqiiq Jabaali

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