वो तो क़हहार हो के बैठे हैं
हम परस्तार हो के बैठे हैं
रास्ते तुमको पाने के सारे
जान दुश्वार हो के बैठे हैं
आप आए जो मेरे गुलशन में
गुल महक-दार हो के बैठे हैं
वो ख़फ़ा होगा हमने सोचा था
तंज़ बेकार हो के बैठे हैं
रात-दिन बस तेरे ख़यालों में
हम गिरफ़्तार हो के बैठे हैं
नोचने जिस्म एक तितली का
साँप तैयार हो के बैठे हैं
दुनिया तो खै़र ठीक है लेकिन
दोस्त दीवार हो के बैठे हैं
मुझको हथियार की ज़रूरत क्या?
लफ्ज़ तलवार हो के बैठे हैं
कोई अहद-ए-वफा़ करो हम सेे
हम वफ़ादार हो के बैठे हैं
बात करने को दिल नहीं करता
इतने बेज़ार हो के बैठे हैं
'उम्र नादानी करने की है 'अमित'
हम समझदार हो के बैठे हैं
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