ik baar jo dhal jaa.e mire dast-e-hunar se | इक बार जो ढल जाए मिरे दस्त-ए-हुनर से

  - A R Sahil "Aleeg"

इक बार जो ढल जाए मिरे दस्त-ए-हुनर से
तस्वीर में आते हैं नज़र शम्स-ओ-क़मर से

आशिक़ है कि शाइर है मुसलमाँ है कि काफ़िर
ये कौन है जो रोज़ गुज़रता है इधर से

सोने दे मुझे पूछ न दुनिया की कहानी
थक हार के लौटा हूँ मैं दुनिया के सफ़र से

कह दे ये सितमगर से कोई द्वार पे जाकर
आया है तो अब जाए दबे पाँव इधर से

फिर कौन उठाए है उसे दोनों जहाँ में
इक बार जो गिर जाए ख़ुदा तेरी नज़र से

निकला है क़दम चार भला कैसे ये आगे
हैरान है शैतान भी इंसाँ के हुनर से

हो जाए न तुम को भी कही 'इश्क़ ये साहिल
शर्मा के वो देखे है मुझे तिरछी नजर से

  - A R Sahil "Aleeg"

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