hijr kii shab hai aaho-zaari hai | हिज्र की शब है, आहो-ज़ारी है

  - A R Sahil "Aleeg"

हिज्र की शब है, आहो-ज़ारी है
हाए! ये कैसी बेक़रारी है

कल नहीं थी, ये कल नहीं होगी,
आज जो दास्ताँ तुम्हारी है

कोई भी इससे बच नहीं पाया
मौत के हाथ ऐसी आरी है

उतना किरदार भी तो भारी कर
जितनी पोशाक तेरी भारी है

आप तो शाह हैं, उलझिए मत,
जानते हैं न? वो भिखारी है

इक क़लन्दर के वास्ते साहिल,
इस फ़क़ीरी में ताजदारी है

  - A R Sahil "Aleeg"

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