"आँखें"

मचलती झील सी मानो कोई दरिया है ये आँखें
तुम्हारे दिल को जाने का कोई जरिया है ये आँखें

तुम्हारे बाल ऊपर से ये मानो रश्क करते हैं
जहाँ से ख़ूब-सूरत है बहुत बढ़िया हैं ये आँखें

मुझे हैरान करती है मेरे ख़्वाबों में आ कर के
कभी मुझ को डराती है मुझे ग़ुस्सा दिखा कर के

ख़ुशी से झूम जाता हूँ अगर वो सामने हो तो
जहाँ में है नहीं दूजा मेरे महबूब सी आँखें

न सोता हूँ न रोता हूँ उसे ही याद करता हूँ
न जाने बन गई कैसे मिरी दुनिया वही आँखें

भरोसा था वही आँखें तो बदली है असंभव था
भला कैसा ये जादू कर गया माशूक की आँखें

नज़र से दिख ही जाता है दिलों में खलबली हो तो
ज़माना पूछता है अब बनेगा आस क्या आँखें

जिसे आँखें दिखाते हो वही तो रहनुमा था फिर
समय बदला तो पत्थर बन गई देखो कई आँखें

कभी तो सोच लो उन का जो तुम से दूर बैठे हैं
वो आँखें कह रही है देख लेना आएगा इक दिन

जो मुझ से दूर रहता है मेरी आँखें बनेगा वो
वो बूढ़ा आदमी है आस में बैठा हुआ लेकिन

ज़रा देखो न 'रंजन' क्या सहारा दे सकेगा वो
सभी रिश्तों को कर धूमिल चुना जिस ने ग़लत आँखें

— ABHISHEK RANJAN

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