इस रास्ते में जब कोई साया न पाएगा

ये आख़िरी दरख़्त बहुत याद आएगा

बिछड़े हुओं की याद तो आएगी जीते-जी
मौसम रफ़ाक़तों का पलट कर न आएगा

तख़्लीक़ और शिकस्त का देखेंगे लोग फ़न
दरिया हबाब सत्ह पे जब तक बनाएगा

हर हर क़दम पे आइना-बरदार है नज़र
बे-चेहरगी को कोई कहाँ तक छुपाएगा

मेरी सदा का क़द है फ़ज़ा से भी कुछ बुलंद
ज़ालिम फ़सील-ए-शहर कहाँ तक उठाएगा

ता'रीफ़ कर रहा है अभी तक जो आदमी
उट्ठा तो मेरे ऐब हज़ारों गिनाएगा

— Azhar Inayati

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