जैसे ग़ुलशन से किसी फूल का पैग़ाम मिले
शाहज़ादी तेरे बच्चों को मिरा नाम मिले
अब के बरसे हुए बादल को सज़ा दे कोई
अब के उजड़ी हुई फसलों का कोई दाम मिले
उन की चाहत है कि पैरों पे खड़ा हो जाऊँ
मेरी ख़्वाहिश है कि माँ-बाप को आराम मिले
तेरे कहने पे किसी रोज़ मुसाफ़िर ठहरें
भूले भटके हुए लोगों को तेरी शाम मिले
वक़्त-दर-वक़्त तिरे हुस्न पे मैं शे'र कहूँ
ज़ब्त-ओ-इश्क़ के मज़दूर को कुछ काम मिले
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