जैसे ग़ुलशन से किसी फूल का पैग़ाम मिले

  - lalit pandey

जैसे ग़ुलशन से किसी फूल का पैग़ाम मिले
शाहज़ादी तेरे बच्चों को मिरा नाम मिले

अब के बरसे हुए बादल को सज़ा दे कोई
अब के उजड़ी हुई फसलों का कोई दाम मिले

उन की चाहत है कि पैरों पे खड़ा हो जाऊँ
मेरी ख़्वाहिश है कि माँ-बाप को आराम मिले

तेरे कहने पे किसी रोज़ मुसाफ़िर ठहरें
भूले भटके हुए लोगों को तेरी शाम मिले

वक़्त-दर-वक़्त तिरे हुस्न पे मैं शे'र कहूँ
ज़ब्त-ओ-इश्क़ के मज़दूर को कुछ काम मिले

  - lalit pandey

More by lalit pandey

As you were reading Shayari by lalit pandey

Similar Writers

our suggestion based on lalit pandey

Similar Moods

As you were reading undefined Shayari