साथ रखना था मगर छोड़ दिया है मैंने
अब उसे खोने का डर छोड़ दिया है मैंने
अब तो लगता ही नहीं मैं हूँ मुसाफ़िर कोई
अब तो लगता है कि घर छोड़ दिया है मैंने
मेरे होठों को भी रुख़्सार की आमद न मिली
उस की आँखों को भी तर छोड़ दिया है मैंने
जिस्म तो जीत लिया हार गया हूँ दिल को
पूँछ ले आया हूँ सर छोड़ दिया है मैंने
अब वो समझेगा किसी रोज़ इशारे मेरे
अपनी बातों से असर छोड़ दिया है मैंने
तुम जिसे अपना बनाने के लिए पागल हो
देख कर एक नज़र छोड़ दिया है मैंने
अब मुहब्बत से कोई लाख पुकारे मुझ को
दिल से दिल तक का सफ़र छोड़ दिया है मैंने
As you were reading Shayari by lalit pandey
our suggestion based on lalit pandey
As you were reading undefined Shayari