Meaning of

नाज़-बरदारी

naaz-bardaari • خیرو

लाड़-प्यार; दुलार

pampering; indulgence

پیار; لاڈ

Persian

छोड़ जाओ मुझे आइना देख लो
ख़ूब-सूरत नहीं एक ग़द्दार हो

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हम ऐसा कहने वाले जब तलक है
ग़ज़ल बंदूक़ पर भारी रहेगी

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हाँ मैं तो लिए फिरता हूँ इक सजदा-ए-बेताब
उन से भी तो पूछो वो ख़ुदा हैं कि नहीं हैं

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ये दाढ़ियाँ ये तिलकधारियाँ नहीं चलतीं
हमारे अहद में मक्कारियाँ नहीं चलतीं

क़बीले वालों के दिल जोड़िए मेरे सरदार
सरों को काट के सरदारियाँ नहीं चलतीं

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बे-गिनती बोसे लेंगे रुख़-ए-दिल-पसंद के
आशिक़ तिरे पढ़े नहीं इल्म-ए-हिसाब को

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यूँंँ हक़ जताते मैं ग़ज़ल हूँ वो तख़ल्लुस है कोई
बहरों में करते क़ैद मिसरे रब्त में होते नहीं

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अना पर बात आए लहरों को भी मोड़ दूँगा
कटे गर्दन भले तेरी अकड़ मैं तोड़ दूँगा

रहूँगा शान से चाहे खड़ी हो मौत सम्मुख
झुकाऊँगा न सर अपना ये साँसें छोड़ दूँगा

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सिर झुकाऊँगा सब को भरोसा न था
देख कर मैं तुझे ख़ुद-ब-ख़ुद झुक गया

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महल में नहीं गर तो बस्ती में मिलते
हक़ीक़त नहीं तो कहानी में मिलते

ये सर्दी तो तब भारी सर्दी में गिनते
तेरे बाल जब मेरी जर्सी में मिलते

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जिस ने गंगा में वुज़ू कर के नमाज़े हैं पढ़ी
वो कभी मुल्क के ग़द्दार नहीं हो सकते

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छोड़ जाओ मुझे आइना देख लो
ख़ूब-सूरत नहीं एक ग़द्दार हो

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हम ऐसा कहने वाले जब तलक है
ग़ज़ल बंदूक़ पर भारी रहेगी

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नाज़-बरदारी एक कोमल देखभाल और दुलार का भाव जगाती है, जो अक्सर पोषणकारी स्नेह से जुड़ा होता है। कविता में, यह प्रेम और प्रिय के कोमल लाड़ के बीच एक नाजुक संतुलन का संकेत देती है।

कवि अक्सर नाज़-बरदारी का उपयोग प्रेमी के कोमल दुलार का वर्णन करने के लिए करते हैं। यह प्रिय को अत्यधिक देखभाल के साथ संजोने के विचार को व्यक्त कर सकता है। यह कठोर प्रेम के रूपों के विपरीत, कोमलता पर जोर देता है।

नाज़-बरदारी कोमल स्नेह का सार पकड़ती है, एक कोमल दुलार जिसे कवि प्रेम की बुनावट में बुनते हैं।