Meaning of

नाज़-बरदारी

naaz-bardaari • خیرو

लाड़-प्यार; दुलार

pampering; indulgence

پیار; لاڈ

Persian

हम ऐसा कहने वाले जब तलक है ग़ज़ल बंदूक़ पर भारी रहेगी — Ali Zaryoun
यूँंँ हक़ जताते मैं ग़ज़ल हूँ वो तख़ल्लुस है कोई बहरों में करते क़ैद मिसरे रब्त में होते नहीं — Priya omar
सिर झुकाऊँगा सब को भरोसा न था देख कर मैं तुझे ख़ुद-ब-ख़ुद झुक गया — Shubham Rai 'shubh'
जिस ने गंगा में वुज़ू कर के नमाज़े हैं पढ़ी वो कभी मुल्क के ग़द्दार नहीं हो सकते — Mohammad Aquib Khan
हाँ मैं तो लिए फिरता हूँ इक सजदा-ए-बेताब उन से भी तो पूछो वो ख़ुदा हैं कि नहीं हैं — Hafeez Jalandhari
बे-गिनती बोसे लेंगे रुख़-ए-दिल-पसंद के आशिक़ तिरे पढ़े नहीं इल्म-ए-हिसाब को — Haidar Ali Aatish
छोड़ जाओ मुझे आइना देख लो ख़ूब-सूरत नहीं एक ग़द्दार हो — Trinetra Dubey

नाज़-बरदारी एक कोमल देखभाल और दुलार का भाव जगाती है, जो अक्सर पोषणकारी स्नेह से जुड़ा होता है। कविता में, यह प्रेम और प्रिय के कोमल लाड़ के बीच एक नाजुक संतुलन का संकेत देती है।

कवि अक्सर नाज़-बरदारी का उपयोग प्रेमी के कोमल दुलार का वर्णन करने के लिए करते हैं। यह प्रिय को अत्यधिक देखभाल के साथ संजोने के विचार को व्यक्त कर सकता है। यह कठोर प्रेम के रूपों के विपरीत, कोमलता पर जोर देता है।

नाज़-बरदारी कोमल स्नेह का सार पकड़ती है, एक कोमल दुलार जिसे कवि प्रेम की बुनावट में बुनते हैं।