Meaning of

मज़म्मत

mazammat • مذمت

निंदा; आलोचना

condemnation; criticism

مذمت; تنقید

Arabic

ग़रीब-ओ-बे-कसों की सब हिमायत क्यूँ नहीं करते
ग़लत को तुम ग़लत कहने की जुरअत क्यूँ नहीं करते

अगर अहल-ए-जहाँ ज़िंदा हो तो बे-ख़ौफ़ होकर फिर
भला ज़ालिम हुकूमत की मज़म्मत क्यूँ नहीं करते

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मुसाफ़िरत जब शुरू करेंगे तो पहले सू-ए-हरम चलेंगे
हम अपने दस्त-ए-अदब में ले कर वफ़ा-ओ-हक़ का अलम चलेंगे

सदा सदा को बुलन्द अपनी करेंगे मज़लूमियत के हक़ में
सदा मज़म्मत करेंगे ज़ुल्मत की राह-ए-हक़ पर क़दम चलेंगे

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ग़रीब-ओ-बे-कसों की सब हिमायत क्यूँ नहीं करते
ग़लत को तुम ग़लत कहने की जुरअत क्यूँ नहीं करते

अगर अहल-ए-जहाँ ज़िंदा हो तो बे-ख़ौफ़ होकर फिर
भला ज़ालिम हुकूमत की मज़म्मत क्यूँ नहीं करते

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मुसाफ़िरत जब शुरू करेंगे तो पहले सू-ए-हरम चलेंगे
हम अपने दस्त-ए-अदब में ले कर वफ़ा-ओ-हक़ का अलम चलेंगे

सदा सदा को बुलन्द अपनी करेंगे मज़लूमियत के हक़ में
सदा मज़म्मत करेंगे ज़ुल्मत की राह-ए-हक़ पर क़दम चलेंगे

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'मज़म्मत' का मूल भाव अस्वीकृति का है, एक आवाज़ जो गलतियों के खिलाफ उठती है। कविता में, यह गहरे असंतोष को व्यक्त करने का साधन बन जाता है, अक्सर नैतिक अधिकार के स्वर के साथ।

कवि अक्सर 'मज़म्मत' का उपयोग सामाजिक मानदंडों या व्यक्तिगत विश्वासघात की आलोचना करने के लिए करते हैं। यह असहमति की एक शक्तिशाली अभिव्यक्ति या असंतोष की एक सूक्ष्म फुसफुसाहट हो सकती है।

कविता के क्षेत्र में, 'मज़म्मत' कवि के आंतरिक संघर्ष और दुनिया की अपूर्णताओं को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण है।