Meaning of

मा'सूम

ma'soom • معصوم

निर्दोष; पवित्र

innocent; pure

معصوم; پاک

Arabic

किसी मासूम ने लूटा था मुझ को
नया दिलबर सयाना चाहता हूँ

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मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा
बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है

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मैं ख़ुद भी एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ
कोई मासूम क्यूँ मेरे लिए बदनाम हो जाए

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हम सेे जो रूठ गया है वो है बहुत मासूम
हम तो औरों को मनाने के लिए निकले है

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हम ने जिस मासूम परी को अपने दिल की जाँ बोला था
उस ने हम को धोखा देकर और किसी को हाँ बोला था

सारे वादे भूल गई तुम कोई बात नहीं जानेमन
लेकिन ये कैसे भूली तुम मेरी माँ को माँ बोला था

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मेरी कोशिश तो यही है कि ये मासूम रहे
और दिल है कि समझदार हुआ जाता है

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जो उन मासूम आँखों ने दिए थे
वो धोके आज तक मैं खा रहा हूँ

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तुम्हें कुछ भी नहीं मालूम लोगों
फ़रिश्तों की तरह मासूम लोगों

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ज़माना देखता है बस ज़माने की निग़ाहों से
भरी महफ़िल में क्यूँँ मासूम को बदनाम करता है

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तू याद आया तेरे जौर-ओ-सितम लेकिन न याद आए
मोहब्बत में ये मा'सूमी बड़ी मुश्किल से आती है

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किसी मासूम ने लूटा था मुझ को
नया दिलबर सयाना चाहता हूँ

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मेरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा
बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है

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अपने मूल अर्थ में, 'मा'सूम' एक ऐसी पवित्रता को दर्शाता है जो दुनिया की कठोरता से अछूती है। यह एक बच्चे की छवि को उभारता है, जो निष्कलंक और सच्चा होता है, जिसकी मासूमियत दुनिया की अच्छाई की संभावना को दर्शाती है। कविता में, यह मासूमियत आशा का प्रतीक बन जाती है और उस पवित्रता की याद दिलाती है जो कभी थी।

कवि अक्सर 'मा'सूम' का उपयोग प्रकृति की अछूती सुंदरता या प्रेम के निष्कलंक सार को उभारने के लिए करते हैं। यह जीवन की कठोर वास्तविकताओं के विपरीत होता है, मासूमियत की नाजुकता और मूल्य को उजागर करता है।

कविता के क्षेत्र में, 'मा'सूम' हमारे भीतर और हमारे चारों ओर मौजूद पवित्रता की कोमल याद दिलाता है, हमें इसे संजोने और संरक्षित करने का आग्रह करता है।