Meaning of

ख़ाक़

khaaq • خاک

धूल; राख

dust; ashes

خاک; راکھ

Persian

उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सह
में जाते हैं
कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए

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कहाँ तो ख़ाक उड़ाता था मुस्कुराता था
मुझ ऐसे शख़्स को भी क्या से क्या बनाया गया

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सदाएँ देते हुए और ख़ाक उड़ाते हुए
मैं अपने आप से गुज़रा हूँ तुझ तक आते हुए

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उम्र का एक और साल गया
वक़्त फिर हम पे ख़ाक डाल गया

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ज़िंदगी ज़िंदा-दिली का है नाम
मुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैं

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ख़ाक को ख़ाक से मिलने नहीं देती दुनिया
मर भी जाएँ तो कफ़न बीच में आ जाता है

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हम जानते तो इश्क़ न करते किसू के साथ
ले जाते दिल को ख़ाक में इस आरज़ू के साथ

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एक बरस और बीत गया
कब तक ख़ाक उड़ानी है

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वतन की ख़ाक ज़रा एड़ियाँ रगड़ने दे
मुझे यक़ीन है पानी यहीं से निकलेगा

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बस्ती बस्ती ख़ाक उड़ाये, बस वहशत का मारा हो
उस सेे इश्क़ की आस न करना जिस का मन बंजारा हो

ख़ुद को शाइ'र कहते रहना दिल को लाख सुकूँ दे दे
लेकिन दुनिया की नज़रों में तुम अब भी आवारा हो

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उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सह
में जाते हैं
कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए

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कहाँ तो ख़ाक उड़ाता था मुस्कुराता था
मुझ ऐसे शख़्स को भी क्या से क्या बनाया गया

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ख़ाक जीवन की क्षणभंगुर प्रकृति को जगाती है, धूल में लौटने की अनिवार्यता। कविता में, यह विनम्र शुरुआत और अंतिम अंत दोनों का प्रतीक है, मृत्यु और जीवन के चक्र की याद दिलाता है।

अक्सर मानव प्रयासों की क्षणभंगुर प्रकृति पर विचार करने के लिए उपयोग किया जाता है। यह भूले हुए साम्राज्यों, समय के शांत क्षय, या सरलता में पाई जाने वाली विनम्रता की छवियाँ उत्पन्न कर सकता है।

ख़ाक हमें जीवन की क्षणभंगुर प्रकृति की याद दिलाती है, शुरुआत और अंत पर एक काव्यात्मक ध्यान।