Meaning of

मक़्ते

makte • مقطعے

अंतिम शेर; निष्कर्ष

ending couplet; conclusion

آخری شعر; نتیجہ

Arabic

अब तो ख़्वाबों में ही उस सेे बात मेरी हो जाती है
काग़ज़ और क़लम होते हैं रात मेरी हो जाती है

ग़ज़लें लिखते-लिखते आँसू काग़ज़ पर गिरते हैं फिर
मतले से ले कर मक्ते तक मात मेरी हो जाती है

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हाथों में उस के है बसी संजीवनी जैसे कहीं
बहती नदी, कंगन को फिर हम ने दमकते देखा है

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आ के नज़दीक मुँह न फेर ग़ज़ल
पास आ बैठ थोड़ी देर ग़ज़ल

सब तेरे नूर से चमकते हैं
लफ़्ज़ मिसरे ख़याल शे'र ग़ज़ल

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हुआ है ज़िक्र मक्ते में कहीं पर नाम का तेरे
दिखा है अक्स तारों में क़लम रातों में चलती है

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क्यूँ आ जाते हो सीधे मक़्ते पर
पहले थोड़ा काम करो मतले पर

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चाँदनी की तरह तुम, चमकते रहो
फूल बनकर के गुलशन में खिलते रहो

है दुआ, दे ख़ुदा, ख़ूब बरक़त तुम्हें
आई दिन यूँँ ही आशिक़ बदलते रहो

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मैं हूँ तुम हो तुम हो मैं हूँ दुनिया से क्या नाता है
गीत ग़ज़ल के हर मक़्ते में नाम तुम्हारा आता है

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वो मुझ को देख कर कुछ ऐसे चंचल हो उठी थी
कोई सूखी नदी ज्यूँ जल से अविरल हो उठी थी

चमकते चंद्रमा की चाँदनी में ज्यूँ चकोरी
नहा धो कर के महकी और निर्मल हो उठी थी

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ये तुझ सेे बात कर के जाना है मैं ने
चमकते क्यूँ है तारे चाँद से मिल के

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दिल लगाया गया ख़ुद लगा ही नहीं
दिल से मेरा कभी वो हुआ ही नहीं

तारे सबके चमकते रहे रात भर
पर मेरे घर का तारा दिखा ही नहीं

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अब तो ख़्वाबों में ही उस सेे बात मेरी हो जाती है
काग़ज़ और क़लम होते हैं रात मेरी हो जाती है

ग़ज़लें लिखते-लिखते आँसू काग़ज़ पर गिरते हैं फिर
मतले से ले कर मक्ते तक मात मेरी हो जाती है

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हाथों में उस के है बसी संजीवनी जैसे कहीं
बहती नदी, कंगन को फिर हम ने दमकते देखा है

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कविता की दुनिया में, 'मक़्ता' ग़ज़ल का अंतिम शेर होता है, जहाँ कवि अक्सर अपना तख़ल्लुस प्रकट करते हैं। यह शेर पूरी कविता का सार होता है, जिसमें उसकी भावनात्मक और विषयगत गहराई समाहित होती है।

कवि 'मक़्ता' का उपयोग एक स्थायी छाप छोड़ने के लिए करते हैं, अक्सर इसमें व्यक्तिगत स्पर्श या गहरी अंतर्दृष्टि शामिल होती है। यह एक हस्ताक्षर के रूप में कार्य करता है, कवि की आवाज़ की अंतिम फुसफुसाहट।

'मक़्ता' कवि का विदाई है, एक नाजुक समापन जो अंतिम शब्दों से परे गूंजता है।