Meaning of

मक़बूल

maqbool • مقبول

स्वीकृत; लोकप्रिय; मान्य

accepted; popular; approved

مقبول; منظور; پسندیدہ

Arabic

'नवी' मक़बूलियत भी अब कहाँ अपनी
हम अपने शहर में अनजान दिखते हैं

0

Download Image

चुप रहते हैं चुप रहने दो राज़ बताओ खोले क्या
बात वफ़ा की तुम करती हो बोलो हम कुछ बोले क्या

उल्फ़त तो अफ़साना है तुम करती खूब सियासत हो
हम भी हैं मक़बूल बहुत अब बोल किसी के होलें क्या

77

Download Image

मिरे अंदाज़ ज़माने से निराले होंगे
आज अँधेरे हैं तो क्या कल को उजाले होंगे

एक रोटी में सुनाते हैं तुझे कितना कुछ
कल से होंटों पे तिरे मेरे निवाले होंगे

कम से कम सैकड़ों को भूख ने मारा होगा
बच गए जितने सभी दर्द ने पाले होंगे

अब हमें मौत भी मक़बूल नहीं करती है
ज़िंदगी तू ही बता किस के हवाले होंगे

हर दफ़ा छीन लिया मेरा निवाला सबने
फिर तो बच्चे भी तिरे भूख ने पाले होंगे

अरे कमरे में मिरे कुछ भी नहीं है सच्ची
चार दीवार मिलेंगी बचे जाले होंगे

शहर-ए-दिल में सुनो तो कोई नहीं रहता है
तुम कहाँ जा रहे हो सब में ही ताले होंगे

छोड़ के ख़ुद को ज़माने को दिया है मरहम
फिर तो बेशक ही तिरे पाँव में छाले होंगे

4

Download Image

दर्द मुहब्बत काँटे फूल
तेरी दी हर चीज़ क़ुबूल

तुझ को इक दिन खोना है
चुभता रहता है ये शूल

तेरी याद के साए में
रहता हूँ हर पल मशग़ूल

काश तुम्हें मैं पा सकता
काश दुआ होती ये क़ुबूल

चाहूँ इस दुनिया से मैं
प्यार हमारा हो मक़बूल

तुझ में बस खोना चाहूँ
दुनिया दारी सब कुछ भूल

1

Download Image

क्या हुआ जो हो गई ग़लती हमें मक़बूल जाना
तुम समझ लेना ग़लत-फ़हमी थी और फिर भूल जाना

भूलने से पहले हो जाएँ अगर हम रू-ब-रू तो
जान कर अनजान बनना और फिर मशगू़ल जाना

1

Download Image

क़लम से हम सभी मक़बूल होते हैं
कि हम सब सेे क़लम मक़बूल होती है

0

Download Image

'नवी' मक़बूलियत भी अब कहाँ अपनी
हम अपने शहर में अनजान दिखते हैं

0

Download Image

चुप रहते हैं चुप रहने दो राज़ बताओ खोले क्या
बात वफ़ा की तुम करती हो बोलो हम कुछ बोले क्या

उल्फ़त तो अफ़साना है तुम करती खूब सियासत हो
हम भी हैं मक़बूल बहुत अब बोल किसी के होलें क्या

77

Download Image

'मक़बूल' शब्द स्वीकृति और मान्यता की भावना को व्यक्त करता है। कविता में, यह अक्सर सामाजिक मानदंडों या स्वीकृति की लालसा, व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों को दर्शाता है।

कवि 'मक़बूल' का उपयोग स्वीकृति और अस्वीकृति के विषयों पर चर्चा करने के लिए करते हैं। यह सामाजिक स्वीकृति के संघर्ष या लोकप्रियता की खट्टे-मीठे स्वभाव को उजागर कर सकता है।

कविता में, 'मक़बूल' समाज के मूल्यों का दर्पण बनता है, जो स्वीकृति की इच्छा और इसके संभावित मूल्य को दर्शाता है।