Meaning of

मक़ता

maqtaa • مقطع

ग़ज़ल का अंतिम शेर

final couplet of a ghazal

غزل کا آخری شعر

Arabic

दर्द से मुझ को निकलना भी नहीं है
सच कहूँ तो कोई रस्ता भी नहीं है

ज़िन्दगी ऐसी ग़ज़ल है दोस्त जिस
में
शे'र कम हैं और मक़्ता भी नहीं है

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किताब-ए-इश्क़ में हर आह एक आयत है
पर आँसुओं को हुरूफ़‌‌‌‌-ए-मुक़त्तिआ'त समझ

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मिरी बातों को वो आधा समझती हैं
मैं मतला कहता हूँ मक़्ता समझती हैं

हुनर हैं शा'इरी मैं शे'र कहता हूँ
मगर इस को तो वो ज़ाया' समझती हैं

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क्यूँ आ जाते हो सीधे मक़्ते पर
पहले थोड़ा काम करो मतले पर

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मैं हूँ तुम हो तुम हो मैं हूँ दुनिया से क्या नाता है
गीत ग़ज़ल के हर मक़्ते में नाम तुम्हारा आता है

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ऐसे भी लोग हैं यहाँ जो अपने नाम से
महफ़िल में पढ़ के आ गए मक़्ता मजाज़ का

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कोई मुझ सा सानी मिल जाएगा तुम को
मक़्ता कह के फिर ख़त्म ग़ज़ल कर दी उस ने

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कभी त्योहारों का बनके कोई हफ़्ता चली आना
सफ़र हो ख़त्म तुमपे बनके वो रस्ता चली आना

कई बरसों से हूँ मैं चाहता लिखना ग़ज़ल ख़ुद पे
सनम करने मुकम्मल बनके तुम मक़्ता चली आना

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पता है सब, तू इक तज़मीन मिसरा है
ग़ज़ल तो कह दिया, मक़्ता नहीं कहना

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बन नहीं सकता मैं मक़्ता उस ग़ज़ल का अब कभी भी
इस लिए अश'आर कह कर साथ, मक़्ता छोड़ रक्खा

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दर्द से मुझ को निकलना भी नहीं है
सच कहूँ तो कोई रस्ता भी नहीं है

ज़िन्दगी ऐसी ग़ज़ल है दोस्त जिस
में
शे'र कम हैं और मक़्ता भी नहीं है

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किताब-ए-इश्क़ में हर आह एक आयत है
पर आँसुओं को हुरूफ़‌‌‌‌-ए-मुक़त्तिआ'त समझ

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'मक़ता' ग़ज़ल का अंतिम शेर होता है, जो अक्सर कवि के तख़ल्लुस को समेटे होता है। यह एक हस्ताक्षर के रूप में कार्य करता है, जो कविता के सार को समेटता है। मक़ता कवि के व्यक्तिगत चिंतन को प्रकट कर सकता है या पूर्ववर्ती शेरों को पुनर्परिभाषित करने वाला मोड़ ला सकता है।

कवि मक़ता का उपयोग एक स्थायी छाप छोड़ने के लिए करते हैं, अक्सर व्यक्तिगत या दार्शनिक अंतर्दृष्टि को समेटे होते हैं। यह एक निष्कर्ष या रहस्योद्घाटन के रूप में कार्य कर सकता है, समापन प्रदान करता है या नई व्याख्याओं को खोलता है।

मक़ता कवि का अंतिम शब्द होता है, एक आत्मनिरीक्षण का क्षण जो कविता से परे गूंजता है। यह वह जगह है जहाँ कवि की आवाज़ ठहरती है, चिंतन के लिए आमंत्रित करती है।