Meaning of

मोमिन

mumin • مومن

विश्वासी; आस्थावान

believer; faithful

مومن; ایمان والا

Arabic

जैसे मीर-ओ-ग़ालिब और मोमिन की ग़ज़लें होती हैं
मैं ने वैसे ही तुझ को दिल में संजोए रक्खा था।

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मीर, ग़ालिब, ज़ौक़, मोमिन, दाग़ पढ़ कर थक गए
काश के तुम बैठ कर ख़ुद को भी पढ़ लेते कभी

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ख़स-ओ-ख़ाशाक चुन-चुन कर परिंदे ने बनाया घर
किया यूँँ आँधियों का सामना छोटी सी कोशिश कर

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कब किस को मिलता है प्यार यहाँ शहरे-दिल्ली में
ग़ालिब-मोमिन सब हैं यार यहाँ शहरे-दिल्ली में

ख़ुद को सब से दूर किया ख़ुद के क़रीब आ बैठे हैं
सब हैं मेरे शुक्र-गुज़ार यहाँ शहरे-दिल्ली में

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रोज़-ए-जुमा मोमिन अदा कर के नमाज़
जाता कही ज़ीशान में हो के सवार

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तवाफ-ए-खाना-ए-काबा है मोमिनों के लिए
तवाफ-ए-तुर्बत-ए-मजनू करो गर आशिक़ हो

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लो चाँद हो गया नमू माह-ए-ख़राम का
ऐ मोमिनों लिबास-ए-सियाह ज़ेब-ए-तन करो

फ़र्श-ए-अज़ा बिछा के अज़ाख़ाने में शजर
अब सुब्ह-ओ-शाम ज़िक्र-ए-ग़रीब-उल-वतन करो

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सदा-ए-क़ल्ब-ए-मोमिन है है ज़िक्र-ए-मुस्तफ़ा अच्छा
है ज़िक्र-ए-मुर्तज़ा अच्छा है ज़िक्र-ए-सय्यदा अच्छा

अली का ज़िक्र करते हैं यूँँ मोमिन बर-सर-ए-महफ़िल
अली का ज़िक्र लगता है ख़ुदा को बा ख़ुदा अच्छा

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मैं किसी पीर को भी नहीं मानता
तो ये मोमिन बताते हैं काफ़िर मुझे

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सनद रहे सब को जल्लादों ने तक़रीरें कर दी हैं
काफ़िर का जो सर काटेगा वो मोमिन कहलाएगा

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जैसे मीर-ओ-ग़ालिब और मोमिन की ग़ज़लें होती हैं
मैं ने वैसे ही तुझ को दिल में संजोए रक्खा था।

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मीर, ग़ालिब, ज़ौक़, मोमिन, दाग़ पढ़ कर थक गए
काश के तुम बैठ कर ख़ुद को भी पढ़ लेते कभी

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'मोमिन' का मूल अर्थ एक ऐसे व्यक्ति से है जो विश्वास और आस्था रखता है, अक्सर धार्मिक विश्वास से जुड़ा होता है। कविता में, यह शब्द अपने धार्मिक अर्थों से परे जाकर पवित्रता, विश्वास और अटल भक्ति का प्रतीक बन जाता है।

कवि अक्सर 'मोमिन' का उपयोग आध्यात्मिक भक्ति और नैतिक अखंडता के विषयों को उजागर करने के लिए करते हैं। यह सांसारिक इच्छाओं के विपरीत होता है, आंतरिक शांति और प्रबोधन की यात्रा को उजागर करता है।

कविता में, 'मोमिन' विश्वास और पवित्रता का प्रकाशस्तंभ बन जाता है, आत्मा को एक उच्च सत्य की ओर ले जाता है।