Meaning of

मुनाफ़िक़

munaafiq • منافق

पाखंडी; कपटी व्यक्ति

hypocrite; deceitful person

منافق; دھوکے باز شخص

Arabic

तवाज़ुन खो चुके ईमान वाले
मुनाफ़िक़ हो गया है गाँव सारा

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मुनाफ़िक़ दोस्तों से लाख बेहतर हैं ख़ुदा दुश्मन
कि ग़द्दारी नवाबों से हुकूमत छीन लेती है

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मुनाफ़िक़ के चेले किए जा रहे हैं
अजब कारना
में किए जा रहे हैं

नमाज़ें तो इनसे अदा हो न पाई
मज़ारों पे सज़दे किए जा रहे हैं

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बस एक बार हो तेरी निगाह मेरी तरफ़
फिर उस के बा'द मुझे कोई शै नहीं दरकार

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ज़मीं को तर-ब-तर करने किसी दिन आएगा बादल
न जाने किन ग़रीबों के घरों को खाएगा बादल

सितारे नोच लाऊँगा किसी दिन ज़िद पे आया तो
अभी ग़र्दिश में हूँ यारों बहुत इतराएगा बादल

ये सारी मछलियाँ जब बद-दुआ देने लगेंगी तब
समुंदर प्यास से तड़पेगा और मर जाएगा बादल

कहीं पर कम कहीं ज़्यादा ये कैसा फ़ैसला तेरा
सॅंभल जा वक़्त है वरना बहुत पछताएगा बादल

मुनाफ़िक़ है ये रातों का किसी को भी नहीं बख़्शा
जवानी ज़ुल्फ़ आँखें और क्या-क्या खाएगा बादल

हमीं हैं जो तुझे सर पे चढ़ाकर फिरते रहते हैं
कुशादा ज़र्फ़ कर लें हम तो क्या टिक पाएगा बादल

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अच्छा तो है बहुत पर मन से नहीं गया है
भीतर गया मगर वो उतने नहीं गया है

मैं ने मुनाफ़िक़ों को बाहर किया है ख़ुद ही
वो शख़्स ज़िंदगी से ऐसे नहीं गया है

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बन जाते हैं अपनी ग़रज़ की ख़ातिर आशिक़ लोग
मेरी नज़र में हैं कुछ ऐसे भी मुनाफिक़ लोग

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मुनाफ़िक और मुशरिक में कहीं अफ़ज़ल नहीं कोई
यहाँँ तो शहर हैं लेकिन इधर जंगल नहीं कोई

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मुनाफि़कों की बहुत ही तवील थी फहरिस्त
जो उस को परखा तो इक नाम और उभर आया

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सभी ग़मों के मुआफिक़ बना दिया है मुझे
मोहब्बतों के मुताबिक़ बना दिया है मुझे

सवाल करने लगा हूँ ख़ुदा की करनी पर
तुम्हारे ग़म ने मुनाफ़िक़ बना दिया है मुझे

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तवाज़ुन खो चुके ईमान वाले
मुनाफ़िक़ हो गया है गाँव सारा

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मुनाफ़िक़ दोस्तों से लाख बेहतर हैं ख़ुदा दुश्मन
कि ग़द्दारी नवाबों से हुकूमत छीन लेती है

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'मुनाफ़िक़' शब्द कपट और दोहरेपन का गहरा अर्थ रखता है। अपने मूल अर्थ में, यह ऐसे व्यक्ति को संदर्भित करता है जो उन विश्वासों या गुणों का दिखावा करता है जो उसके पास नहीं होते। कविता अक्सर ऐसे पाखंड के भावनात्मक उथल-पुथल और सामाजिक प्रभाव की गहराई में जाती है।

कवि 'मुनाफ़िक़' का उपयोग विश्वासघात और आंतरिक संघर्ष के विषयों की खोज के लिए करते हैं। यह अक्सर सामाजिक मानदंडों या व्यक्तिगत संबंधों की आलोचना के रूप में कार्य करता है, मानव स्वभाव की छिपी परतों को उजागर करता है।

कविता में 'मुनाफ़िक़' शब्द आत्मा के अंधेरे कोनों का दर्पण बनता है, आत्मनिरीक्षण और ईमानदारी का आग्रह करता है।