ज़मीं को तर-ब-तर करने किसी दिन आएगा बादल

न जाने किन ग़रीबों के घरों को खाएगा बादल

सितारे नोच लाऊँगा किसी दिन ज़िद पे आया तो
अभी ग़र्दिश में हूँ यारों बहुत इतराएगा बादल

ये सारी मछलियाँ जब बद-दुआ देने लगेंगी तब
समुंदर प्यास से तड़पेगा और मर जाएगा बादल

कहीं पर कम कहीं ज़्यादा ये कैसा फ़ैसला तेरा
सॅंभल जा वक़्त है वरना बहुत पछताएगा बादल

मुनाफ़िक़ है ये रातों का किसी को भी नहीं बख़्शा
जवानी ज़ुल्फ़ आँखें और क्या-क्या खाएगा बादल

हमीं हैं जो तुझे सर पे चढ़ाकर फिरते रहते हैं
कुशादा ज़र्फ़ कर लें हम तो क्या टिक पाएगा बादल

— "Nadeem khan' Kaavish"

More by "Nadeem khan' Kaavish"

Other sher from the same pen

See all from "Nadeem khan' Kaavish" →

Shaheed Shayari

Shers of shaheed.

All Shaheed Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling