हमारा इक सहारा था

उसी से बस गुज़ारा था

ये जो आँखें हैं ना तेरी
यहाँ इक घर हमारा था

कभी शा
में सुहानी थी
कभी सूरज इशारा था

तू जब तक साथ था मेरे
हाँ हर ग़म मुझ से हारा था

तेरे ख़ातिर जहाँ डूबा
वो दरिया भी किनारा था

नज़र में हुस्न लाखों थे
हमें पर वो ही प्यारा था

कहीं भी दिल न लग पाया
तेरा जाना ख़सारा था

उसी ने फिर उजाड़ा यार
जिसे हम ने सँवारा था

अलग ही नूर था इस
में
मेरा चेहरा सितारा था

कहानी तक लिखी तुझ पर
ग़ज़ल तक में उतारा था

वो शाइ'र मर गया इक दिन
अली जिस का सहारा था

— "Nadeem khan' Kaavish"

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Jalwa Shayari

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