Meaning of

रूख़

rookh • رخ

चेहरा; मुख; सूरत

face; visage; countenance

چہرہ; صورت; رخسار

Arabic

वहशत के कारखाने से ताज़ा ग़ज़ल निकाल
ऐ सब्र के दरख़्त मेरा मीठा फल निकाल

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वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है
कहाँ तक कार का पीछा करोगे?

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वो पास क्या ज़रा सा मुस्कुरा के बैठ गया
मैं इस मज़ाक़ को दिल से लगा के बैठ गया

दरख़्त काट के जब थक गया लकड़हारा
तो इक दरख़्त के साए में जा के बैठ गया

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तेरी निगाह-ए-नाज़ से छूटे हुए दरख़्त
मर जाएँ क्या करें बता सूखे हुए दरख़्त

हैरत है पेड़ नीम के देने लगे हैं आम
पगला गए हैं आप के चू
में हुए दरख़्त

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क्यूँ लिखूँ ज़ुल्फ़-ओ-लब-ओ-रुख़सार पे नग़्में बहुत
प्यार की पहली नज़र रुस्वाइयाँ ही क्यूँ लिखूँ

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अब मैं समझा तिरे रुख़्सार पे तिल का मतलब
दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रक्खा है

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तू ने देखी है वो पेशानी वो रुख़्सार वो होंठ
ज़िंदगी जिन के तसव्वुर में लुटा दी हम ने

तुझ पे उठी हैं वो खोई हुई साहिर आँखें
तुझ को मालूम है क्यूँ उम्र गँवा दी हम ने

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इंसान को ही अक़्ल ये आना तो है नहीं
धरती के ही अलावा ठिकाना तो है नहीं

भर लो सिलेंडरों में जहाँ भर की ऑक्सीजन
तुम को मगर दरख़्त लगाना तो है नहीं

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ये किस के द्वार पे खड़ा ज़िंदा दरख़्त है
इन पत्थरों के शहर में इंसान कौन है

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रेल की सीटी में कैसे हिज्र की तम्हीद थी
उस को रुख़्सत कर के घर लौटे तो अंदाज़ा हुआ

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वहशत के कारखाने से ताज़ा ग़ज़ल निकाल
ऐ सब्र के दरख़्त मेरा मीठा फल निकाल

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वो दुल्हन बन के रुख़्सत हो गई है
कहाँ तक कार का पीछा करोगे?

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मूल रूप में 'रूख़' चेहरे या मुख का संकेत करता है, जो भावनाओं और विचारों को प्रकट करता है। कविता में, यह सुंदरता, दुख और लालसा के भावों का कैनवास बन जाता है, प्रिय के चेहरे पर प्रकाश और छाया के क्षणिक खेल को पकड़ता है।

कवि अक्सर 'रूख़' का उपयोग प्रिय के चेहरे का वर्णन करने के लिए करते हैं, उसकी सुंदरता और उससे उत्पन्न भावनाओं को पकड़ते हैं। इसे हृदय के साथ विपरीत किया जाता है, जो छिपी हुई भावनाओं को धारण करता है। चेहरा आंतरिक अशांति या शांति को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण बन जाता है।

'रूख़' के रूप में चेहरा कविता में एक मौन कहानीकार है, जो आत्मा की गहराइयों को प्रकट करता है। यह एक मुखौटा भी है और एक रहस्योद्घाटन भी।