Meaning of

ज़ुल्मत

zulmat • ظلمت

अंधकार; अस्पष्टता

darkness; obscurity

اندھیرا; ابہام

Arabic

ये ज़ुल्मतें कि चराग़ों पे हावी हो रही हैं
वो हुस्न सामने आए सियाही छट जाए

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उस की सारी ज़ुल्मत को अब बातिल ही हम बोलेंगे
उस के सारे लँगूरों को बुज़दिल ही हम बोलेंगे

उस ज़ालिम की इस गंदी साज़िश से बिल्कुल मत डरना
क़ातिल को पूरी ताक़त से क़ातिल ही हम बोलेंगे

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लाख कहते रहें ज़ुल्मत को न ज़ुल्मत लिखना
हम ने सीखा नहीं प्यारे ब-इजाज़त लिखना

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ज़ुल्मत-परस्त कहो मुझे क्यूँँ मैं ने तो
बच्चों के होंठों पर हैं मुस्कान भरे

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एक ही नाथ हैं जगत में वो
प्रभु जगन्नाथ एक हैं अपने

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शब-ए-ज़ुल्मत भी हो जाए पशेमाँ
दिया ऐसा जलाना चाहता हूँ

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मुसाफ़िरत जब शुरू करेंगे तो पहले सू-ए-हरम चलेंगे
हम अपने दस्त-ए-अदब में ले कर वफ़ा-ओ-हक़ का अलम चलेंगे

सदा सदा को बुलन्द अपनी करेंगे मज़लूमियत के हक़ में
सदा मज़म्मत करेंगे ज़ुल्मत की राह-ए-हक़ पर क़दम चलेंगे

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ख़्वाबों को देखने से मिला कुछ नहीं मुझे
लेकिन शब-ए-ज़ुल्मत से गिला कुछ नहीं मुझे

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जग उठा हूँ रह-ए-ज़िंदा में सो जलना पड़े है
मैं वगरना वो दिया हूँ जिसे ज़ुल्मत है पसंद

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जब से ज़ुल्मत को बयान-ए-हुस्न तेरा दे दिया
उन दिनों से मेरे आज़ू-बाज़ू साए बैठे हैं

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ये ज़ुल्मतें कि चराग़ों पे हावी हो रही हैं
वो हुस्न सामने आए सियाही छट जाए

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उस की सारी ज़ुल्मत को अब बातिल ही हम बोलेंगे
उस के सारे लँगूरों को बुज़दिल ही हम बोलेंगे

उस ज़ालिम की इस गंदी साज़िश से बिल्कुल मत डरना
क़ातिल को पूरी ताक़त से क़ातिल ही हम बोलेंगे

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ज़ुल्मत गहरे अंधकार की भावना को जगाता है, जो भौतिक और रूपक दोनों अर्थों में होता है। कविता में, यह अक्सर अज्ञात, छिपे हुए, या निराशा की गहराई का प्रतीक होता है। यह शब्द रहस्य और आत्मनिरीक्षण का भार लिए होता है, पाठक को भीतर और बाहर की छायाओं को खोजने के लिए आमंत्रित करता है।

कवि ज़ुल्मत का उपयोग आंतरिक उथल-पुथल, अस्तित्वगत भय, या छिपे हुए में पाए जाने वाले सौंदर्य को व्यक्त करने के लिए करते हैं। यह प्रकाश के साथ विरोधाभास करता है, केवल एक विपरीत के रूप में नहीं, बल्कि एक पूरक के रूप में जो दोनों की समझ को परिभाषित और गहरा करता है।

ज़ुल्मत हमें अदृश्य पर विचार करने के लिए आमंत्रित करता है, हमें छायाओं में अर्थ खोजने के लिए प्रेरित करता है।