वो किसी बात का चर्चा नहीं होने देता

अपने ज़ख़्मों का वो जलसा नहीं होने देता

ऐसे कालीन को मैं किस लिए रक्खूँ घर में
वो जो आवाज़ को पैदा नहीं होने देता

ये बड़ा शहर गले सब को लगा लेता है
पर किसी शख़्स को अपना नहीं होने देता

उस की फ़ितरत में यही बात बुरी है यारो
बहते पानी को वो दरिया नहीं होने देता

ये जो अनबन का है रिश्ता मेरे भाई साहब !
घर के माहौल को अच्छा नहीं होने देता।

— Gyan Prakash Vivek

More by Gyan Prakash Vivek

Other ghazal from the same pen

See all from Gyan Prakash Vivek →

Life Shayari

Shers of life.

All Life Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling