इन बुझते चिराग़ों को जला क्यूँ नहीं देते
तहरीर अँधेरों की मिटा क्यूँ नहीं देते
सुनता नहीं आवाज़ जो बस्ती में तुम्हारी
जंगल में खड़े होकर सदा क्यूँ नहीं देते
हम खानाबदोशों का न घर है ना ठिकाना
मत पूछो कि हम घर का पता क्यूँ नहीं देते
भूचाल की धमकी का अगर डर है तो लोगों
इन कच्चे मकानों को गिरा क्यूँ नहीं देते
हर शै का तुम्हें रूप नज़र आता है काला
आँखों से सियाह चश्मा हटा क्यूँ नहीं देते
वो पेड़ जो षड्यंत्र करे धूप से मिल कर
उस पेड़ को तुम जड़ से गिरा क्यूँ नहीं देते
— Gyan Prakash Vivek















