bhale ilzaam kisi doosre par jaata hai | भले इल्ज़ाम किसी दूसरे पर जाता है

  - Dhirendra Pratap Singh

भले इल्ज़ाम किसी दूसरे पर जाता है
आदमी मुफ़्लिसी में भूख से मर जाता है

मेरी आवारगी पर आपको हैरत कैसी
शाख़ से टूट के हर पत्ता बिखर जाता है

मेरे मालिक तुझे तो सब पता है तू ही बता
अब मेरे हिस्से का सब प्यार किधर जाता है

उसे तो फिर मैं पलट कर कभी तकता ही नहीं
इक दफ़ा जो मेरी नज़रों से उतर जाता है

बारहा हादसों ने बदले नहीं हाल तेरे
यार ठोकर से तो पत्थर भी सँवर जाता है

उसके बारे में मैं बस इतना ही कह सकता हूँ
उसकी सूरत से ख़ुद आईना निखर जाता है

इसी से ख़ुश हैं क़बीले के सभी टूटे लोग
दर्द साँसों के ठहरने पे ठहर जाता है

माँ के आँचल से लिपट कर सदा रहता था जो
अब वो बेचारा फ़क़त छुट्टी में घर जाता है

आइना देख के ये राज़ खुला है हम पर
दिल के तूफ़ान का आँखों पे असर जाता है

इन फ़क़ीरों को बताएँ सभी दौलत वाले
ख़ला जो सीने में है पैसों से भर जाता है

सादगी देख के 'धीरेन्द्र' पिघल मत जाना
उसकी आदत है वो वादों से मुकर जाता है

  - Dhirendra Pratap Singh

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