ज़्यादा किसी को तो कहीं कम ढोने हैं
जो भी है दुनिया में उसे ग़म ढोने हैं
हैरान मत हो होंठ की सिगरेट से
उस बे-वफ़ा ख़ातिर अभी रम ढोने हैं
अब क्या बताऊँ आप को मैं अपना हाल
बस चाय पी कर सर्द मौसम ढोने हैं
ये सोच कर आगे बढ़ाना तुम क़दम
इस इश्क़ के रस्ते तुम्हें हम ढोने हैं
दिल लग गया है दूसरी के साथ अब
पर उम्र भर पहली के मातम ढोने हैं
— Dhirendra Pratap Singh















