Dhirendra Pratap Singh

Dhirendra Pratap Singh

@hidhirusingh

Dhirendra Pratap Singh shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Dhirendra Pratap Singh's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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Sher

ग़ौर से देखो मेरी आँखों में तुम्हें लगता नहीं कि तन्हा हूँ मैं — Dhirendra Pratap Singh
परिंदे उड़ गए पत्तों ने साथ छोड़ दिया शजर का जिस्म दिसम्बर ने फिर निचोड़ दिया — Dhirendra Pratap Singh
मेरी तस्वीर और भी अच्छी आएगी लगा कर देखो ना फ़िल्टर उदासी का — Dhirendra Pratap Singh
रौशनी को छोड़ कर आना पड़ा वनवास अपना सब दिए थे ताक में दीपावली हो साथ मिल कर — Dhirendra Pratap Singh
देख कर चिढ़ाता है अब तो आइना भी रोज़ किस के साथ रहना था किस के साथ रहते हो — Dhirendra Pratap Singh
अना ने खोल दी छतरी हमारे दरमियाँ वरना बहुत दुश्वारियाँ होतीं गुज़िश्ता रात बारिश में — Dhirendra Pratap Singh
हमारी मुस्कुराहट पे न जाओ हम अंदर से तुम्हारे जैसे ही हैं — Dhirendra Pratap Singh
उस ने भी रक्खा ऑप्शन की तरह जिस की प्रायोरिटी था बनना हमें — Dhirendra Pratap Singh
किसी बेहतर की चाह में 'धीरेन्द्र' खो दिया एक बेहतरीन उस ने — Dhirendra Pratap Singh
फ़ाएदा क्या तुम्हारे हुस्न का जान साथ हो कर भी चाय पी रहे हम — Dhirendra Pratap Singh
ख़्वाब भले न आए पर नींद तो आए आँखों में — Dhirendra Pratap Singh
पहले ही बना लेता दुश्मन तो भी रहती तसल्ली लेकिन उस ने दोस्त बना कर सारे राब्ते तोड़े — Dhirendra Pratap Singh
प्यार के रस्ते पे मुमकिन नहीं बस प्यार मिले दूर तक कोई सड़क सीधी नहीं जाती दोस्त — Dhirendra Pratap Singh
फोन में हम को सँजो कर रखने वाली दिल में भी रखती तो कितना अच्छा होता — Dhirendra Pratap Singh
और तो कुछ भी नहीं होता किसी के जाने से यार आँखें रोना सीख लेतीं होंठ हँसना भूल जाते — Dhirendra Pratap Singh
अब भरोसा नहीं होता किसी की क़समों पर जब से तोड़े हैं किसी ने सभी वादे अपने — Dhirendra Pratap Singh
तभी तो बद-तमीज़ी पर तेरे ग़ुस्सा नहीं आता मुझे मालूम है बिन माँ के लड़के कैसे होते हैं — Dhirendra Pratap Singh

Ghazal

भले इल्ज़ाम किसी दूसरे पर जाता है आदमी मुफ़्लिसी में भूख से मर जाता है मेरी आवारगी पर आप को हैरत कैसी शाख़ से टूट के हर पत्ता बिखर जाता है मेरे मालिक तुझे तो सब पता है तू ही बता अब मेरे हिस्से का सब प्यार किधर जाता है उसे तो फिर मैं पलट कर कभी तकता ही नहीं इक दफ़ा जो मेरी नज़रों से उतर जाता है बारहा हादसों ने बदले नहीं हाल तेरे यार ठोकर से तो पत्थर भी सँवर जाता है उस के बारे में मैं बस इतना ही कह सकता हूँ उस की सूरत से ख़ुद आईना निखर जाता है इसी से ख़ुश हैं क़बीले के सभी टूटे लोग दर्द साँसों के ठहरने पे ठहर जाता है माँ के आँचल से लिपट कर सदा रहता था जो अब वो बेचारा फ़क़त छुट्टी में घर जाता है आइना देख के ये राज़ खुला है हम पर दिल के तूफ़ान का आँखों पे असर जाता है इन फ़क़ीरों को बताएँ सभी दौलत वाले ख़ला जो सीने में है पैसों से भर जाता है सादगी देख के 'धीरेन्द्र' पिघल मत जाना उस की आदत है वो वादों से मुकर जाता है — Dhirendra Pratap Singh
ज़रा भी दिल में नहीं है चुभन बिछड़ने की वगरना माथे पे होती शिकन बिछड़ने की अधर भी उस परी के आज तक नहीं चू में बता रही है जो कारण बदन बिछड़ने की अभी तो मिलने भी वो माह-रू नहीं आई अभी से हो रही तुम को घुटन बिछड़ने की वो लौट आएगा उस की नज़र बता रही है पसंद आया है उस को छुअन बिछड़ने की जब ईद आती है परदेश में तो मिल के गले मनाते है सभी मातम वतन बिछड़ने की हमारे पाँव के छालों से गर न जान सको तो झुर्रियाँ बता देंगी थकन बिछड़ने की विरह की आग में धीरेन्द्र क्यूँ झुलस रहे हो लगी थी तुम को ही पहले अगन बिछड़ने की — Dhirendra Pratap Singh
तमाम मुश्किलें आसान कौन करता है किसी पे इतना भी एहसान कौन करता है तेरे बदन की बनावट को देख कर समझा शरीफ़ बंदों को शैतान कौन करता है यही तो सोच के मैदान-ए-इश्क़ में उतरा वफ़ा परस्तों का नुक़सान कौन करता है शुरू शुरू में तो सब रखते हैं ख़याल बहुत सफ़र के आख़िरी में ध्यान कौन करता है फ़क़त ये देखने को खोला दिल का दरवाज़ा अब अपने झूठ से हैरान कौन करता है बताओ अहल-ए-सियासत को छोड़ कर यारो घरों में हिन्दू मुसलमान कौन करता है रदीफ़ क़ाफ़िया मिस्रा मैं जानता हूँ दोस्त सुख़नवरों को परेशान कौन करता है उसे भी फूल ही अच्छे लगे तो हैरत क्या चमन में काँटों का अरमान कौन करता है ख़िज़ा के मौसमों का जब असर नहीं होता तो फिर दरख़्तों को वीरान कौन करता है करेगा रुसवा बहुत ये गले का टैटू मगर ख़याल वस्ल के दौरान कौन करता है — Dhirendra Pratap Singh
चलो देखें कि क़ुर्बत कौन देता है अब इस दीवार को छत कौन देता है खुलेगा राज़ अब ये तेरी ज़ुल्फ़ों से हवा को इतनी हिम्मत कौन देता है नई बस्ती बसाने वाले क्या जाने पुराने घर को ज़ीनत कौन देता है ये तो हम हैं जो तुम को साथ रखते हैं वगरना तुम को इज़्ज़त कौन देता है हमारे गाँव के लड़के बताएँगे बड़े शहरों में ज़िल्लत कौन देता है किसी दिन पूछना तुम अपनी आँखों से मेरे होंठों को रिश्वत कौन देता है यूँँ ही बोला नज़ूमी हाथ पढ़ कर कल बताओ ऐसी क़िस्मत कौन देता है ये कोई पूछने की बात है पागल ग़रीबों को मुसीबत कौन देता है तरस खाओ कुछ अपने हाल पर 'धीरेन्द्र' ग़मों को इतनी क़ुर्बत कौन देता है — Dhirendra Pratap Singh
इस लिए हम सफ़र बनाया था उस में अपना वुजूद पाया था रफ़्ता रफ़्ता तराश कर उस ने बे-वफ़ाई को फ़न बनाया था शौक़ उस को खिलौनों का है बहुत उस के इक दोस्त ने बताया था जानते हो वो क्यूँँ हुआ पागल एक बुलबुल से दिल लगाया था एक दो साल हम पे भी यारो एक पंडित का घटिया साया था कभी तो टूटना ही था मेरा दिल कितनों का मैं ने दिल दुखाया था एक तितली ने पंख तोड़ लिए इतना फूलों ने आज़माया था उस ने इंसानों वाली हरकत की हम ने जिस को ख़ुदा बनाया था उस को हिस्से में सिर्फ़ ख़ुशियाँ मिलीं मेरी क़िस्मत में बस ग़म आया था इस लिए गालियाँ दी जुगनू को रौशनी सब जगह लुटाया था ग़ैर-हाजिर थी क्लास में वो आज पूछो मत कैसे दिन बिताया था दुनिया तो ख़ैर दुनिया थी लेकिन मुझे अपनों ने भी रुलाया था रम्ज़ जो इन किताबों में छुपा है जौन को भी बहुत सताया था — Dhirendra Pratap Singh

Nazm