गाँव छोड़ने की बद-दुआ मुझे भी लग गई
यार तेरे शहर की हवा मुझे भी लग गई
मैं ने घर बना लिया इक अजनबी से शहर में
या'नी उम्र-क़ैद की सज़ा मुझे भी लग गई
लोगों की ज़बान पर मेरा भी शे'र आ गया
दोस्तों बुज़ुर्गों की दुआ मुझे भी लग गई
— Dhirendra Pratap Singh
यार तेरे शहर की हवा मुझे भी लग गई
मैं ने घर बना लिया इक अजनबी से शहर में
या'नी उम्र-क़ैद की सज़ा मुझे भी लग गई
लोगों की ज़बान पर मेरा भी शे'र आ गया
दोस्तों बुज़ुर्गों की दुआ मुझे भी लग गई
Other ghazal from the same pen
Voices in the same orbit
Poetry by feeling