आपके साथ हमारा भी तो हो सकता है
इक निवाले में गुज़ारा भी तो हो सकता है
जिसे सब लोग भँवर कहते हैं दरिया के बीच
वो कोई एक किनारा भी तो हो सकता है
हाल मजनूँ सा बना कर भला क्यूँँ रहना यार
इश्क़ का खेल दुबारा भी तो हो सकता है
जिसको टहला रही हो तुम यूँँ बना कर नौकर
घर का वो राज-दुलारा भी तो हो सकता है
इतनी तनक़ीद अभी से न करो रौशनी पर
ये जो जुगनू है सितारा भी तो हो सकता है
मैंने कुछ यूँँ किया इज़हार-ए-मुहब्बत उस सेे
मेरा सरनेम तुम्हारा भी तो हो सकता है
As you were reading Shayari by Dhirendra Pratap Singh
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