अलग है जात अपनी इक बहाना था
उसे दरअस्ल मुझ से दूर जाना था
हमारे पास तो हम भी नहीं थे दोस्त
तुम्हारे साथ तो पूरा ज़माना था
लकड़हारे ने ऊपर ही नहीं देखा
परिंदे का शजर पे इक ठिकाना था
ख़फ़ा होने पे तुम भी हो गए ग़ुस्सा
तुम्हें तो पास आ कर के मनाना था
नसीहत तुम मुझे पहले ही देते दोस्त
दिल-ओ-जाँ इश्क़ में कितना लगाना था
उसे मासूम चेहरे से मुहब्बत में
न जाने कितनों को पागल बनाना था
कहानी मेरी उस ड्रा
में के जैसी है
वो मेरे पास तुम हो जिस
में गाना था
निभा पाए नहीं दो साल भी दोनों
जो रिश्ता सात जन्मों तक निभाना था
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