तमाम मुश्किलें आसान कौन करता है

किसी पे इतना भी एहसान कौन करता है

तेरे बदन की बनावट को देख कर समझा
शरीफ़ बंदों को शैतान कौन करता है

यही तो सोच के मैदान-ए-इश्क़ में उतरा
वफ़ा परस्तों का नुक़सान कौन करता है

शुरू शुरू में तो सब रखते हैं ख़याल बहुत
सफ़र के आख़िरी में ध्यान कौन करता है

फ़क़त ये देखने को खोला दिल का दरवाज़ा
अब अपने झूठ से हैरान कौन करता है

बताओ अहल-ए-सियासत को छोड़ कर यारो
घरों में हिन्दू मुसलमान कौन करता है

रदीफ़ क़ाफ़िया मिस्रा मैं जानता हूँ दोस्त
सुख़नवरों को परेशान कौन करता है

उसे भी फूल ही अच्छे लगे तो हैरत क्या
चमन में काँटों का अरमान कौन करता है

ख़िज़ा के मौसमों का जब असर नहीं होता
तो फिर दरख़्तों को वीरान कौन करता है

करेगा रुसवा बहुत ये गले का टैटू मगर
ख़याल वस्ल के दौरान कौन करता है

— Dhirendra Pratap Singh

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