ये न सोचो फ़क़त भुलाना है
दिल कहीं और भी लगाना है
एक बच्चे से पूछा पढ़ते हो
डर के बोला नहीं कमाना है
अव्वल आना बहुत ज़रूरी है
आइने से नज़र मिलाना है
घर के लोगों ने सपने देखे हैं
हमें ग़ज़लों में सर खपाना है
उस के दिल में बनाना है मुझे घर
मछली की आँख ही निशाना है
मुझ
में पोशीदा बच्चा कहता है रोज़
बात करनी है मुस्कुराना है
आज इस छोर पर तो कल उस पार
इन सफ़ीनों का क्या ठिकाना है
इक ग़ज़ल जो लिखी नहीं अब तक
आज महफ़िल में वो सुनाना है
देख कर बेर खाना मेरे राम
एक शबरी को जूठा खाना है
— Dhirendra Pratap Singh















