jaane kya gham hai jo saa.e se lipt jaata hai | जाने क्या ग़म है जो साए से लिपट जाता है

  - Aditya Tiwari

जाने क्या ग़म है जो साए से लिपट जाता है
शाम ढलते ही मेरा साया सिमट जाता है

ज़िन्दगी ऐसी अनोखी सी डगर है जिस में
पाँव रुक जाते हैं तो रास्ता कट जाता है

मुझ से उस बेवफ़ा के आके लिपट जाने में
कोई तो है जो मेरी राह से हट जाता है

ख़ुद को उलझाने से वो जल्द भले मिल न सके
देर होने का कुछ एहसास तो घट जाता है

शाम होते ही कोई उगता है मेरे दिल से
सुब्ह होते ही मेरे दिल में सिमट जाता है

सुना है राह पे हम साथ भी चल सकते हैं
ऐसा कर लेने से भी रास्ता कट जाता है

  - Aditya Tiwari

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