जाने क्या ग़म है जो साए से लिपट जाता है
शाम ढलते ही मेरा साया सिमट जाता है
ज़िन्दगी ऐसी अनोखी सी डगर है जिस में
पाँव रुक जाते हैं तो रास्ता कट जाता है
मुझ से उस बेवफ़ा के आके लिपट जाने में
कोई तो है जो मेरी राह से हट जाता है
ख़ुद को उलझाने से वो जल्द भले मिल न सके
देर होने का कुछ एहसास तो घट जाता है
शाम होते ही कोई उगता है मेरे दिल से
सुब्ह होते ही मेरे दिल में सिमट जाता है
सुना है राह पे हम साथ भी चल सकते हैं
ऐसा कर लेने से भी रास्ता कट जाता है
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