वक़्त इक पल में यूँँ दुश्वार निकल जाता है
ख़ून के रब्त से भी प्यार निकल जाता है
और क्या घाव अता होंगे मेरे पाँव को अब
कोई भी ख़ार हो हर बार निकल जाता है
जब मदद हाथ बढ़ाए तो लबों से पहले
मेरी ख़ुद्दारी से इंकार निकल जाता है
हर वो दिलदार जिसे चाहने लगता हूँ मैं
ऐन मौक़े पे समझदार निकल जाता है
उतनी रफ़्तार से दिन और निकल जाते काश
जितनी रफ़्तार से इतवार निकल जाता है
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