ख़ुद की हाजत की ख़ुशी की क़ब्र है
मेरे अंदर हर किसी की क़ब्र है
मौत ही बस ज़ीस्त की तुर्बत नहीं
ज़िन्दगी भी ज़िंदगी की क़ब्र है
इक दिया जलता है और कुछ फूल हैं
वो है मंदिर या किसी की क़ब्र है
ख़ाक का तिनका हो या फिर हो दरख़्त
एक जैसी हर किसी की क़ब्र है
हैं कफ़न उस पे ये दफ़्तर के हिसाब
डायरी अब शाइरी की क़ब्र है
शम्स उगने तक ही है ज़ीस्त-ए-चराग़
रौशनी ही रौशनी की क़ब्र है
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