बिछड़ते वक़्त तेरी आँख भी तो भर गई होती
अगर सच में तुझे मुझ सेे ज़रा भी आशिक़ी होती
मोहब्बत में ये रातें गर कहीं जल्दी नहीं आती
मेरे हिस्से में कोई शाम भी तो सुरमई होती
उदासी से भरी ग़ज़लें मेरे हिस्से नहीं आतीं
मेरे हाथों से उसकी माँग उस दिन भर गई होती
रखे तो ख़ुदकुशी के है सभी सामान कमरे में
गले से मैं लगा लेता अगर फिर ज़िन्दगी होती
जलाकर ख़ाक कर देगी धधकती आग सीने में
लगा लेता जो सीने से तो ये भी बुझ गई होती
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