सारे जहाँ को अपना तरफ़-दार कीजिए

लेकिन हमें न राह की दीवार कीजिए

ख़ुद की नज़र में ख़ुद ही न गिर जाएँ हम कहीं
इतना न आप हम को गुनहगार कीजिए

आएगी इस तरफ़ भी ख़रीदार की नज़र
इक शोर ज़ोर से सर-ए-बाज़ार कीजिए

दूजा नहीं शरीक कोई और मैं ने ही
ख़ुद का किया है क़त्ल गिरफ़्तार कीजिए

लगने लगूँ मैं आप की महफ़िल का आप लोग
अपनी तरह मुझे भी अदाकार कीजिए

— Sadik Ali Shadab

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