जिस पर करे निगाह के वो तीर का असर

होता नहीं है उस पे किसी पीर का असर

तर्क-ए-तअल्लुक़ात के दौरान तेरे लफ़्ज़
मेरे जिगर पे कर गए शमशीर का असर

तुम बे-वफ़ा का नाम न देना कभी उसे
उस पर हुआ है मेरी ही तक़दीर का असर

फिर यूँ हुआ कि तेरी कमी खल गई हमें
कुछ रोज़ तो रहा तिरी तस्वीर का असर

ऐ इश्क़ तेरी क़ैद से छूटे हुए ये लोग
महसूस करते रहते हैं ज़ंजीर का असर

— Sadik Ali Shadab

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