आना न चाहते थे जो अपनों के सामने
फिरते हैं दर-ब-दर से वो ग़ैरों के सामने
ऐसे हुआ हूँ देख के हैरान मैं उसे
जादू हुआ हो जैसे के बच्चों के सामने
तेरा ग़ुरूर उस को कुचल कर चला गया
इज़्ज़त पड़ी थी जो तिरे पैरों के सामने
मर जाऊँगा मैं ऐसे ही इक रोज़ देखना
उम्मीद जैसे मर गई आँखों के सामने
उस को तो अपने घर का भी रस्ता नहीं पता
रहबर बना हुआ है जो अंधों के सामने
मुस्कान खींच लाए उदासी की शक्ल पर
मायूस हो के बैठी थी यारों के सामने
— Sadik Ali Shadab














