बुराई का ज़माना वो बुराई कर के मानेगा
मेरा दिल भी तो पागल है ख़ुदाई कर के मानेगा
उसे मंज़िल न भाएगी जुदाई कर के मानेगा
वो मानेगा नहीं सीधा लड़ाई कर के मानेगा
उजालों से कहो थोड़ी ठहर जाऍं पनाहों में
अँधेरा ताज पहनाए रिहाई कर के मानेगा
वफ़ा को वो समझता है सज़ा की इक निशानी सी
मगर इक दिन मोहब्बत की दुहाई कर के मानेगा
वो सच के साथ रह पाए ये मुमकिन ही नहीं लगता
हक़ीक़त को भी झूठी वो गवाही कर के मानेगा
परिंदा कह रहा है अब दु'आओं की ज़बाँ में सब
ये दिल सब कुछ उसी की रस्म-दाई कर के मानेगा
— Kushal "PARINDA"















