मुझे तो ये ज़माना मानता है
मगर तू बस ठिकाना मानता है
जकड़ ले गर हमें पहलू में कोई
तो ये समझो ख़ज़ाना मानता है
मेरी धड़कन में बसते हैं जो लम्हे
उन्हें दिल आशियाना मानता है
तेरी चुप में भी इक आवाज़ है जो
उसे रूहों का गाना मानता है
मैं जब भी ज़िक्र करता हूँ तेरा नाम
वो सज्दा भी बहाना मानता है
नज़र जो तुझ पे ठहरी है सदास
उसे ये आब-ए-दाना मानता है
तुझे सोचूँ तो सब कुछ रौशनी है
अँधेरा भी उजाला मानता है
'परिंदा' अब भी तेरे दर पे झुका है
उसे ये सिर झुकाना मानता है
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