लगे अच्छा जो भी कहने दिया जाए
पुरानी बात को रहने दिया जाए
किसी के 'इश्क़ में होता फ़ना कोई
वो दर्द-ए-हिज्र फिर सहने दिया जाए
मेरी ही इंतिहा का तू भी हिस्सा था
सफ़र में फ़ासला रहने दिया जाए
ज़मीं से ही इमारत का पता चलता
बुरी जब नींव हो ढहने दिया जाए
ग़मों में फ़ासला करता अगर कोई
उसे वाजिब जो है कहने दिया जाए
मनोहर क्या ख़ुशी ग़म को बयाँ करना
अभी अश्कों में सब बहने दिया जाए
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